Wednesday, January 10, 2018

ईश्वर हमें हमारा पारिश्रमिक देता है ( लघु लेख )



- इंदुबाला सिंह
हम श्रम करते हैं । अथक परिश्रम के बाद भी जब हमें वांछित फल नहीं मिलता है तब हम बरबस कह उठते हैं
' ईश्वर जरूर हमारी समस्याओं का समाधान करेगा ।'
और हम निश्चिंत हो जाते हैं । किसीपर अपनी समस्याओं के समाधान का भार छोड़ना हमारे मन का नकारात्मक भाव समाप्त कर देता है ।
ऐसे में आज सुबह सुनी एक बंगालिन की लोकोक्ति 'भगवान काना है । ' मुझे सोंचने को प्रेरित कर दी ।
उस सत्तर वर्षीय बंगालन के पास उसके अपने जीवन का अनुभव था । वह गलत तो हो ही नहीं सकती , ऐसा मुझे लगा । 'भगवान भी सबल की सहायता करता है ।' पल भर में वह स्वगत कह उठी ।

दादाजी जब अपने पिता से डर कर भागे


- इंदुबाला सिंह
मैं छोटा था तब अपने पिताजी के साथ ही उनके स्कूल के हॉस्टल में रहता था । मुझे दूध पसन्द नहीं था ।
एक बार मैंने सबेरे का दूध नहीं पीया । पिता मुझे पीटने के लिये दौड़ाये । मैं भागा और ' बचाईये ' कहते हुये गणित सर के पीछे छुप गया ।
मेरे पिता स्कूल के हेडमास्टर थे ।
मेरे गणित के मास्टर मेरे पिता से डरे नहीं ।
वे बोले - ' मैं राजपूत हूं ।अपने शरण में आये बच्चे को नहीं छोडूंगा । आप उसे नहीं मार सकते । '

शिक्षक सदा छात्र है ।


- इंदु बाला सिंह
सरकारी नौकरी लग गई थी । बी एड न करने पर नौकरी छूट सकती थी । दो बेटियों और गर्भवती पत्नी को गांव में छोड़ एक साल की बी एड पढ़ाई आसान न थी । महेंद्र जी हिंदीभाषी प्रदेश के थे और उड़ीसा में उड़िया माध्यम से पढ़ना आसान न था ।
हॉस्टल में उड़िया पसन्द का खाना मिलता था । शाम भर रूममेट गप्पें हांकते थे और रात को पढ़ते थे ।
महेंद्र जी ने अपना समाधान निकाला । जब शाम को रूममेट बातें करते रहते थे तब वे सो जाते थे और भोर भोर जब सब सोये रहते थे तब उनकी पढ़ाई शुरू होती थी ।
आखिर खत्म हुआ बी एड का कोर्स ।
बी एड के बाद भी महेंद्र जी का पढ़ने का शौक बना रहा । अब वे प्राइवेट एम० ए० पढ़ने लगे ।
अब वे अपने बच्चों व पत्नी को अपने साथ ही रखे थे ।
सफल शिक्षक आजीवन छात्र रहता है ।

चौकनी असीमा का स्मार्ट मोबाईल


Thursday, January 11, 2018
10:35 AM


-इंदु बाला सिंह

असीमा , स्वस्थ , प्लस टू में पढ़नेवाली लड़की थी |  कुछ महीनों से उसे हर सप्ताह हल्का फुल्का बुखार होता था फिर ठीक हो जाता था |
उसका मन किसी काम में न लगता था | पढाई में वह हमेशा अव्वल रहती थी वह अपनी  कक्षा में |  घर में भाई , बहन असीमा को आलसी लड़की कहते थे |  उसका घर अमीर था | अपने माता पिता की वह लाड़ली थी |

इस बार उसे जब बुखार हुआ तो रविवार का दिन था | असीमा ने सोंचा - ' क्यों न डाक्टर को दिखाऊं खुद को | वैसे भी आज इतवार है स्कूल नागा भी नहीं होगा | '

घर के नौकर के साथ असीमा अस्पताल गयी | डाक्टर ने उसका ब्लड चेक अप के बाद ही कोई दवा लिखने को कहा | ब्लड रिपोर्ट में असीमा के खून में व्हाइट ब्लड सेल अधिकता में पाये गये |
डाक्टर ने दवा लिख दिया |
असीमा ने दवा तो खाना शुरू कर दिया पर वह गूगल में व्हाइट ब्लड सेल की अधिकता से होने से बीमारी की खोज करने लगी |
न जाने क्यों असीमा को लगा उसे ब्लड कैंसर हो सकता है |
उसने सुना था उसके एक परिचित एक महीने के बुखार में ही ब्लड कैसर की बीमारी से चल बसे थे |
असीमा ने अपनी चिंता अपने माता पिता को बताई | पिता असीमा की चिंता सुन चौंक पड़े | उन्होंने अपनी बेटी कहा - तुम्हें ऐसा लगता है तो हम बम्बई के कैंसर अस्पताल में तुम्हारा चेक अप करवाएंगे |

अपने माता पिता के साथ असीमा बम्बई पहुंची | असीमा को अस्पताल में भरती कर डाक्टर ने विभिन्न विभिन्न टेस्ट किया |
असीमा को ब्लड कैंसर था |
डाक्टर ने असीमा के माता पिता को आश्वासन दिया - चिंता न करें | आपकी बेटी ठीक हो जायेगी | आपलोग एकदम ठीक समय पर अस्पताल पहुंचे हैं |
असीमा के माता पिता छ: महीने बम्बई में रह कर इलाज करवाये बेटी का |
स्वस्थ हो कर  लौटी असीमा लौटी अपने घर |

चौकनी असीमा की जान उसके स्मार्ट मोबाईल ने बचाई  

Friday, June 30, 2017

हमारा अपना मकान था


Saturday, July 01, 2017
6:25 AM

-इंदु बाला सिंह


अपना मकान हमने बेच दिया है | हमारे बेटे को एक साल हो गये नौकरी में लगे | हम आपका मकान किराये पर चाहते हैं |
मैंने उसे सात दिन का समय देने के लिये कहा |

और वह महिला अपना मोबाईल नम्बर मुझे दे कर चली गयी |

मैं इस महिला को पहचानती थी | घर में युवा बेटी व पति थे | पति कोई बिजिनेस करता था |

मकान ससुर ने बनवाया था | अब मकान खाना तो नहीं खिलाता | हो सकता है पति ने कर्ज लिया था हो | कर्ज चुकाने के लिये वे लोग मकान बेच दिये हों | पर उस महिला का मनोबल बहुत था | वह महिला अपने मकान के आस पास ही कोई मकान भाड़े पर ले कर रहना चाहती थी | आम लोग तो अपमान से अपना मुहल्ला ही छोड़ देते हैं |

मैंने सोंचा आखिर क्यों लोग अंत तक अभिमान में डूबे रहते हैं | वह महिला अपने घर में पेइंग गेस्ट रख सकती थी | अपना ड्राइंग रूम कुछ घंटों के लिये किसी कोचिंग इंस्टिट्यूट को दे सकती थी | सोंचने पर मकान बचाने के सैकड़ों उपाय निकल जाते हैं | और अब यह सब तो पति की समझदारी पर निर्भर रहता है |
सर से छत निकल जाने देना अदूरदर्शिता है | व्यक्ति अपना रेसिडेंसियल स्टेटस भी खो बैठता है |

पर वह परिवार अपनी मरी पहचान को अब भी ढो रहा था |




Monday, April 10, 2017

पिता की बेटियां


Tuesday, April 11, 2017
7:24 AM


 - इंदु बाला सिंह

कालेज में यूनिफार्म हो गया है |

मैं खुश हूं | लड़कियां बिगड़ेंगी नहीं | यूनिफार्म समानता लाता है मन में | कोई बड़ा या छोटा नहीं होता |

हमारे मुहल्ले में एक कालेज खुल गया है |

गजब है , इतने फ्री सरकारी कालेज होते हुये भी प्राइवेट कालेज का खुलना मुझे अचम्भित करता है |

-' तुम पवित्रा कालेज में पढ़ती हो | ' दो लडकियों को कालेज यूनिफार्म में सड़क पर से गुजरते देख मैं पूछ बैठी |

-' हां ' सुंदर सी दिखती लड़की चटपट उत्तर दिया |

-' प्लस टू कालेज है ? '

-' नहीं ग्रजुएट कालेज है | '

-' आर्ट्स कालेज है ? ' मैनें सोंचा ...आखिर अपने मुहल्ले की जानकारी रखनी चाहिये |

-' नहीं साइंस कालेज है | '

इस कालेज में लडकियों की संख्या ज्यादा थी |

मैं अचंभित हुयी |

-' क्या सब्जेक्ट पढ़ाये जाते हैं | '

-' PCM '

मेरा दिल दुखा |

-'फीस कितनी है ? ' मैं पूछे बिना न रह सकी |

-' पुरे एक साल की फीस ले लेते हैं | ' अबकी वही सुन्दरवाली लड़की खुल गयी थी | ' हमारे कालेज में होस्टल भी है | होस्टल की फीस अलग है | हमारे कालेज में होस्टल का भी पूरे साल का फीस ले लेते हैं | लडकियों का होस्टल यहीं पास में है और लडकों का दूर में है | कालेज की बस बच्चों को होस्टल से ले के आती है | '

लड़की एक सांस में बोल गयी |

-'कालेज का प्रिंसिपल कौन है ?

दोनों लड़कियां एक दुसरे का मुंह देखने लगीं | दोनों अलग अलग नाम बोलने लगीं |

मैं समझ गयी | उन लडकियों को अपने प्रिंसिपल का नाम ही नहीं मालुम था |

-'अभी कहां जा रही हो तुम लोग ? '

फिर मुस्कुराई सुन्दरवाली लड़की ...' गुपचुप खाने | '

मैं चिंतित हो गयी |

न जाने क्यों मैं युवाओं की बड़ी चिंता करती हूं | अध्यापन छूटने के बाद भी अवचेतन मन में सोया ' छात्र सुधार ' जाग जाता है |

-' गुपचुप की दूकान तो बहुत दूर है | ' मैं कहे बिना न रह सकी |

मेरी आँखों में और कोई प्रश्न न पा , वे दोनों लड़कियां आगे बढ़ गयीं |

कालेज से निकल कर लड़कियां दूर जा रहीं थीं , गुपचुप खाने | पर मैं निश्चिन्त थी | लड़कियां सुरक्षित थीं | आखिर उन्होंने यूनिफार्म पहना हुआ था |

लडकियों के जन्मदाता प्राईवेट कालेज की पढाई में इतना खर्च कर रहे थे |
 फिर उन्हें अपनी लडकियों पर उनके ब्याह में भी खर्च करना था |



ये लड़कियां फाईनल एग्जाम देंगी की नहीं क्या पता | और एग्जाम देंगी तो पास भी होंगी की नहीं क्या पता |


मन को परेशान होने को एक नया मुद्दा मिल गया था | आखिर ' पवित्रा कालेज ' के बच्चे रोज मेरे ही घर के सामने से तो रोज गुजरते थे |

Thursday, January 5, 2017

गोरा चिट्टा दस वर्षीय


06 January 2017
07:57



रोहन  हमारी गली के पीछे मकान में काम करता था | उसकी उम्र दस वर्ष के आसपास की थी होगी | गोरा चिट्टा प्यारा सा लड़का था वह | उसका मालिक अकेले घर में रहता था |

एक दिन वह हमारे घर में आया और हमसे कहीं काम दिलवा देने के लिये कहने लगा | हमें कामवाले की जरूरत थी सो हमने उसे अपने ही घर में रख लिया |

दुसरे दिन रोहन का मालिक हमारे घर पहुंच गया | रोहन उसे वापस चाहिये था | और रोहन छुप गया हमारे घर की छत पर | वह बिलकुल जाने को तैयार न था अपने पुराने मालिक के पास | उसका कहना था कि वह मालिक उसे बिजली का शाक देता है |

एक दिन उसने हमारे घर काम छोड़ दिया और लौट गया अपने गांव अपनी विधवा माँ के पास |

उपरोक्त घटना के सात साल बाद एक आवाज सुनी मैंने - ' भाभी ! '

मैं मुड़ कर देखी | रोहन था |

' भाभी आप यहाँ ? '

मैंने ( मन ही मन चौंक कर ) हंस कर कहा - ' तुम यहाँ कैसे ? ''


" भाभी ! मैं यहां अपने गाँव का कपड़ा बेचने आया हूं | "